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Sunday, 27 November 2022

मुसलमान नहीं समझे ज्ञान कुरान

भूत-प्रेत की बाधा से मिली निजात

मैं शाहिना गर्ग, शिमला (हिमाचल प्रदेश) की रहने वाली हूँ। मैंने पोस्ट ग्रेजुएट किया है। एक मुस्लिम परिवार से संबंध होने के नाते मैं रोजे रखना, नमाज करना ये सब करती थी क्योंकि मुझे भी अल्लाह की तलाश थी। मुझे प्रेत बाधा की समस्या हो गई थी। मैंने बहुत सारे पीर, फकीरों, मजारों पर दिखाया। लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। मेरी शादी एक हिन्दू परिवार में हुई। मैंने हिन्दू रीति-रिवाज के हिसाब से भी भक्ति साधना की। लेकिन कोई लाभ
नहीं हुई। मेरे ससुराल वालों ने भी मुझे बहुत जगह दिखाया। लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। मानसिक और आर्थिक 
 परेशानी सम्पूर्ण परिवार की बढ़ गई थी। फिर हमारे एक रिश्तेदार हैं जो शिमला में ही रहते हैं। उन्होंने हमें बताया 
 कि आप संत रामपाल जी महाराज की शरण में चले जाओ। वहाँ सब ठीक हो जाएगा। लेकिन हमें भरोसा नहीं हुआ और हम वापिस घर आ गए। उन्होंने हमें एक किताब ज्ञान गंगा भी दी। लेकिन हमने उसे भी 3.4 महीने तक ऐसे
ही रखे रखा। फिर हम बहुत ज्यादा परेशान होते गए तो हमने संत रामपाल जी महाराज से जून 2014 में नाम दीक्षा ली। जब संत रामपाल जी महाराज जी ने मुझे आशीर्वाद दिया तो ऐसे लगा कि मन से पता नहीं कितना भार उतर गया और संत जी ने कहा कि सब ठीक हो जाएगा। फिर हम घर आ गए और मेरी प्रेत बाधा भी समाप्त हो गई। मैं एकदम ठीक हो गई। मेरी बीमारी की वजह से हमारा तालाक भी होने वाला था जो संत रामपाल जी महाराज से नाम दीक्षा लेने के बाद में टल गया। आज हम अच्छे से रह रहे हैं। मेरे पति के पास में जॉब नहीं थी। संत रामपाल जी महाराज की दया से आज उनकी जॉब भी लग गई है। संत रामपाल जी महाराज पवित्रा शास्त्रों के अनुसार भक्ति विधि बताते हैं। भगत समाज से मेरा यही निवेदन है कि आप संत रामपाल जी महाराज जी की शरण में आएँ।
वही पूर्ण संत हैं जो सही भक्ति विधि बताते हैं। 
भक्तमति शाहिना गर्ग
शिमला, हिमाचल प्रदेश
सम्पर्क सूत्र:- 8307744506
   

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आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। Sant Rampal Ji Maharaj YOUTUBE चैनल पर प्रतिदिन 7:30-8.30 बजे। संत रामपाल जी महाराज जी इस विश्व में एकमात्र पूर्ण संत हैं। आप सभी से विनम्र निवेदन है 

Tuesday, 23 June 2020

क्या गीता जी का नित्य पाठ करने का कोई लाभ नहीं ?

क्या गीता जी का नित्य पाठ करने का या दान करने का कोई लाभ नहीं

धार्मिक सद्ग्रन्थों के पठन-पाठन से ज्ञान यज्ञ का फल मिलता है। यज्ञ का फल कुछ समय स्वर्ग या जिस उद्देश्य से किया उसका फल मिल जाता है, परन्तु मोक्ष नहीं। नित्य पाठ करने का मुख्य कारण यह होता है कि सद्ग्रन्थों में जो साधना करने का निर्देश है तथा जो न करने का निर्देश है उसकी याद ताजा रहे। कभी कोई गलती न हो जाए। जिस से हम वास्तविक उद्देश्य त्याग कर गफलत करके शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण (पूजा) न करने लग जाऐं तथा मनुष्य जीवन के मुख्य उद्देश्य की याद बनी रहे कि मनुष्य जीवन का मूल उद्देश्य आत्म कल्याण ही है जो शास्त्र अनुकूल साधना से ही संभव है।

जैसे एक जमींदार को वृद्धावस्था में पुत्र की प्राप्ति हुई। किसान ने सोचा जब तक बच्चा जवान होगा, अपने खेती-बाड़ी के कार्य को संभालने योग्य होगा, कहीं मेरी मृत्यु न हो जाए। इसलिए किसान ने अपना अनुभव लिख कर छोड़ दिया तथा अपने पुत्र से कहा कि पुत्र जब तू जवान हो, तब अपने खेती-बाड़ी के कार्य को समझने के लिए इस मेरे अनुभव के लेख को प्रतिदिन पढ़ लेना तथा अपनी कृषि करना। पिता जी की मृत्यु के उपरान्त किसान का पुत्र प्रतिदिन पिता जी के द्वारा लिखे अनुभव के लेख को पढ़ता। परन्तु जैसा उसमें लिखा है वैसा कर नहीं रहा है। वह किसान का पुत्र क्या धनी हो सकता है ? कभी नहीं। वैसे ही करना चाहिए जो पिता जी ने अपना अनुभव लेख में लिखा है। ठीक इसी प्रकार पवित्र गीता जी के पाठ को तो श्रद्धालु नित्य कर रहे हैं परन्तु साधना सद्ग्रन्थ के विपरीत कर रहे हैं। इसलिए गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 के अनुसार व्यर्थ साधना है।

जैसे तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी) की पूजा गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 तथा 20 से 23 में मना है तथा श्राद्ध निकालना अर्थात् पितर पूजा, पिण्ड भरवाना, फूल (अस्थियां) उठा कर गंगा में क्रिया करवाना, तेरहवीं, सतरहवीं, महीना, छःमाही, वर्षी आदि करना गीता अध्याय 9 श्लोक 25 में मना है। व्रत रखना गीता अध्याय 6 श्लोक 16 में मना है। लिखा है कि हे अर्जुन ! योग (भक्ति) न तो बिल्कुल न खाने वाले (व्रत रखने वाले) का सिद्ध होता है, ... अर्थात् व्रत रखना मना है।
भूखों को भोजन देना, कुत्तों आदि जीव-जन्तुओं व पशुओं को आहार कराना आदि बुरा नहीं है, परन्तु पूर्ण संत के माध्यम से उनकी आज्ञा अनुसार दान तथा यज्ञ आदि करना ही पूर्ण लाभदायक है।

जैसे एक कुत्ता कार के अंदर मालिक वाली सीट पर बैठकर यात्रा करता है। कुत्ते का ड्राईवर मनुष्य होता है। उस पशु को आम मनुष्य से भी अधिक सुविधाऐं प्राप्त होती हैं। अलग से कमरा, पंखा तथा कुलर लगा होता है आदि-आदि।


जब वह नादान प्राणी मनुष्य शरीर में था, दान भी किया परन्तु मनमाना आचरण (पूजा) के माध्यम से किया जो शास्त्र विधि के विपरीत होने के कारण लाभदायक नहीं हुआ। प्रभु का विधान है कि जैसा भी कर्म प्राणी करेगा उसका फल अवश्य मिलेगा। यह विधान तब तक लागू है जब तक तत्वदर्शी संत पूर्ण परमात्मा का मार्ग दर्शक नहीं मिलता।

जैसा कर्म प्राणी करता है वैसा ही फल प्राप्त होता है। इस विद्यान के अनुसार वह तीर्थों तथा धामों पर या अन्य स्थानों पर भण्डारे द्वारा तथा कुत्ते आदि को रोटी डालने के कर्म के आधार पर कुत्ते की योनी में चला गया। वहाँ पर भी किया कर्म मिला। कुत्ते के जीवन में अपनी पूर्व जन्म की शुभ कर्म की कमाई को समाप्त करके गधे की योनी में चला जाएगा। उस गधे के जीवन में सर्व सुविधाऐं छीन ली जायेंगी। सारा दिन मिट्टी, कच्ची-पक्की ईंटे ढोएगा। तत्पश्चात् अन्य प्राणियों के शरीर में कष्ट उठाएगा तथा नरक भी भोगना पड़ेगा। चैरासी लाख योनियों का कष्ट भोग कर फिर मनुष्य शरीर प्राप्त करता है। फिर क्या जाने भक्ति बने या न बने। जैसे धाम तथा तीर्थ पर जाने वाले के पैरों नीचे या जिस सवारी द्वारा जाता है उसके पहियों के नीचे जितने भी जीव जंतु मरते हैं उनका पाप भी तीर्थ व धाम यात्री को भोगना पड़ता है। जब तक पूर्ण संत जो पूर्ण परमात्मा की सत साधना बताने वाला नहीं मिले तब तक पाप नाश (क्षमा) नहीं हो सकते, क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, महेश, ब्रह्म (क्षर पुरुष/काल) तथा परब्रह्म (अक्षर पुरुष) की साधना से पाप नाश (क्षमा) नहीं होते, पाप तथा पुण्य दोनों का फल भोगना पड़ता है। यदि वह प्राणी गीता ज्ञान अनुसार पूर्ण संत की शरण प्राप्त करके पूर्ण परमात्मा की साधना करता तो या तो सतलोक चला जाता या दोबारा मनुष्य शरीर प्राप्त करता। पूर्व पुण्यों के आधार से फिर कोई संत मिल जाता है। वह प्राणी फिर शुभ कर्म करके पार हो जाता है।

इसलिए उपरोक्त मनमाना आचरण लाभदायक नहीं है।